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कानून अभी जिंदा है ‘सुल्तान’

सलमान सेलिब्रिटी है। सैकड़ों दिल की धड़कन हैं। काला हिरण शिकार केस में जब उन्हें सजा सुनाई गई तो किसी ने इस फैसले का स्वागत किया तो किसी ने उनको जमानत मिल जाने को लेकर दुआएं की। लोगों की दुआओं का असर भी दिखा। सलमान खान को काला हिरण मामले में आखिरकार जमानत मिली और 2 रातों से जोधपुर सेंट्रल जेल में कैदी नंबर 106 बनकर रह रहे सलमान खान जेल से बाहर आ गए।  इस पूरे प्रकरण में सोशल मीडिया में  मजेदार रिएक्शन सामने आए।कई लोग सलमान के खिलाफ आए इस फैसले से नाराज नजर आए, वहीं कुछ लोगों का कहना है कि कानून हर किसी के लिए बराबर होना चाहिए। खैर सोशल ट्रेंड को समझा जाए तो कई ने लिखा -  "काले हिरण का जीवनकाल: 10 से 15 साल, काले हिरण को मारने के बाद कोर्ट में केस का जीवनकाल: 20 साल" वहीं गुस्से में लोगों ने पोस्ट किया -हिरण को तो इंसाफ मिल गया, सलमान की कार से मरे इंसानों का क्या? लोगों ने खुलकर सोशल मीडिया पर अपनी बातों को रखा।   यह तो रही सोशल मीडिया की बातें। लेकिन सलमान को सजा सुनाए जाने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने यह कहकर एक नया विवाद पैदा क...

एक पत्रकार के सवालों से बौखलाए रामदेव, पत्रकार को बताया दिग्विजय का दूत

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बाबा रामदेव 3 अक्टूबर को मतदाता जागरूकता अभियान का शंखनाद करने तो पहुँचे..लेकिन जागरूकता अभियान की आड़ में वो प्रधानमंत्री  डॉ.मनमोहन सिंह, यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गाँधी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी पर बरसते नजर आए..उन्होंने भ्रष्टाचार में डूबी सरकार पर तंज कसे.. रायपुर प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कांफ्रेस में जब एक पत्रकार ने तमाम भ्रष्टाचार की बातों के बीच बाबा रामदेव से उनके दो ट्रस्ट पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट और दिव्य योग मंदिर का टर्नओवर और बाबा द्वारा टैक्स भरे जाने से संबंधित सवाल किया तो बाबा की भौंहे तन गई. उन्होंने  कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा उस पत्रकार को भेजे जाने की बात कहकर अपना बचाव करते नजर आए..उन्होंने उस पत्रकार पर ही सवाल खड़े करते हुए कहा कि क्या तुम्हें दिग्विजय सिंह ने भेजा है.. बाबा रामदेव छत्तीसगढ़ मतदाताओं को को जागरूक करने तो पहुँचे हैं..लेकिन जब उनके ट्रस्ट के आय-व्यय और टैक्स भरे जाने को लेकर एक पत्रकार सवाल कर रहा था तो वो अपनी वेबसाइट पर मौजूद आंकड़ों की बात कहकर उस पत्रकार की अनभिज्ञता पर सवाल उठान...

प्रधानमंत्री के कितने नाम.. रोबोट, देहाती औरत, नामर्द....! पद की गरिमा को लेकर सोचने की जरूरत

भारत के प्रधानमंत्री पद की कोई गरिमा नहीं रह गई है..जो चाहे इस गरिमा को तार-तार करने में लगा हुआ है..आज योगगुरू बाबारामदेव ने प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह को नामर्द बोल दिया..तो कई देहाती औरत कह देता है..तो कोई प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह द्वारा लाए जा रहे अध्यादेश पर ही सवाल खड़े कर रहा है.कभी उन्हें रोबोट कहा जाता है..तो कभी और न जाने क्या-क्या कहते हैं.. जहां एक और पिछले शुक्रवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली के प्रेस क्लब में अपने ही सरकार द्वारा लाए जा रहे अध्यादेश पर सवाल उठाए...तो वहीं गुरूवार को रायपुर प्रेस क्लब में योगगुरू बाबारामदेव ने प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह को नामर्द बोल दिया..इसके पहले भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह के प्रति अगाध समर्थन का इज़हार करते हुए कहा था कि अगर राहुल गांधी प्रधानमंत्री की गरिमा नहीं घटाते तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की हिम्मत नहीं पड़ती कि वो भारत के प्रधानमंत्री को देहाती औरत कहते. वहीं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा आगामी लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रा...

नक्सली गढ़ में साधना न्यूज

नक्सलियों के गढ़ में सबसे पहले पहुँची साधना न्यूज की ओवी : नक्सलियों ने ली ओवी की तलाशी : कलेक्टर के अपहरण के मामले को लेकर तमाम अटकलों पर लगाया विराम : नक्सलियों के दुर्गम इलाकों से साधना न्यूज की लाइव तस्वीरें. साधना न्यूज मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के कवरेज को लेकर एक बार फिर अपने दर्शकों के विश्वास पर खड़ा उतरा है..प्रदेश के दर्शकों के अलावा नेशनल इलेक्ट्रानिक मीडिया ने भी साधना न्यूज की खबरों को तवज्‍जो दिया.. कलेक्टर के अगवा होने के पहले ही दिन से साधना न्यूज ने सधी और सटीक खबरें दिखाई. साधना न्यूज ने छत्तीसगढ़ के दुर्गम नक्सली क्षेत्र सुकमा के ताड़मेटला से लाइव तस्वीरें दिखाकर अटकलों पर विराम लगाया.. साधना न्यूज की पूरी टीम ने हिम्मत और दिलेरी के साथ लालगढ़ में कदम रखा.. जिसका नतीजा यह हुआ है कि माओवादियों ने साधना न्यूज को अपना पहला इंटरव्यू दिया.. जिस इंटरव्यू ने कई मीडिया हाउसेस में चल रहे तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया.. इस इंटरव्यू को कई पत्रकारों ने फर्जी भी करार दिया.. कई ने सराहा भी.. लेकिन इन सबके बीच किसी ने यह पूछने की जहमत नहीं समझी...

चुनाव पर राजनीति की बिसात

पांच राज्यों में हो रहे चुनाव में सभी पार्टियों ने अपने तरकश से तीर निकाल कर कमान कस ली है..वादों और प्रतिवादों का दौर जारी है..लोकलुभावन वादों से जनता का दिल जीतने की भरपूर कोशिश की जा रही है..कोई राम के नाम पर वोट मांग रहा है..तो कोई अल्लाह के नाम पर अपनी किस्मत अजमा रहा है..चुनावी मौसम में हर रोज रंग बदलते दिख रहे हैं..कोई किसी को जमीनी हकीकत से रूबरू करा रहा है..तो कोई स्थानीय और बाहरी मुद्दों पर अपनी रोटी सेंक रहा है...हर पार्टी पांच साल के लिए सत्ता में आने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रही है..पांच राज्यों में हो रहे चुनावों की बिसात पर चालें चली जा चुकी है..सभी मोहरे अपनी-अपनी जगह पर दम भर रहे हैं.....दे-दे वोट दे दे..हर पार्टी यही अलाप कर रही है..लेकिन सबसे बड़े इस लोकतंत्र में बाजी तो जनता के हाथ में है..जो चुपचाप और खामोशी से सभी पार्टियों की दलीलें सुन रही है..धर्म के नाम पर तो वोट बटोरने की पुरजोर कोशिश की जा रही है..लेकिन जिस तरह बिहार में जात-पात की राजनीति को वहां के मुआम ने दरकिनार कर दिया...और विकास को तरजीह दी..क्या इस बार ऐसा हो पाएगा...इस पर सब की नजर है...राजनीतिज्ञ विशे...

पूर्वोत्तर की अनोखी शमां

  पूर्वोत्तर की मिलजुली संस्कृति के अनोखे संगम के साथ लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से रायपुर में सांस्कृतिक कार्यक्रम ऑक्टेव 2011 की बेमिसाल शुरूआत हुई..खुले आसमां तले तीन स्तरीय मंच पर पूर्वोत्तर का खनकदार नृत्य..अंग-अंग की खास भाव-भंगिमा का मोहक असर..मृदंग की थाप, बांसुरी की तान और झाल की झनक..नृत्यप्रेमियों का हुजूम..साथ में गुलाबी ठंड का सुहाना मौसम..मानो संध्या की धड़कन में पावों की थिरकन हो रही हो रवां..ऑक्टेव 2011 में पुलिस लाईन ग्राउंड में रंग-बिरंगी रोशनी के बीच जीवंत हो रहा था यह नजारा.. कार्यक्रम का आकर्षण पारंपरिक फैशन शो के रूप में सामने आई..इसमें आठों राज्य के लोगों ने अपने-अपने राज्य के परिधानों के साथ कैटवाक किया..नगालैंड, मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि प्रदेशों के कलाकारों ने भी अपने परिधानों से दर्शकों पर छाप छोड़ी..इसके बाद इन राज्यों के लोकनृत्यों की बारी थी..मणिपुर के थांग ता व ढोल ढोलक चोलम की प्रस्तुति..मणिपुर में याओशांग यानी होली के मौके पर इसकी प्रस्तुति की जाती है..भक्तिरस से परिपूर्ण इस नृत्य का प्र...

F1 रेस: रफ्तार का महासंग्राम

30 अक्टूबर रविवार दोपहर 3 बजे जिगर थाम के बैठने का समय आ गया था..जब इंडियन ग्रांप्री फॉर्मूला वन रेस में रविवार को विश्व के शीर्ष 24 फॉर्मूला वन ड्राइवरों के बीच रफ्तार की बादशाहत के लिए जबरदस्त होड़ देखने को मिली..क्रिकेट, हॉकी, कुश्ती, मुक्केबाज़ी, तैराकी, तीरदाज़ी तरह-तरह के खेलों से हम अच्छी तरह वाकिफ हैं..लेकिन भारत में इन दिनों जिस खेल की चर्चा है..वो है फ़ॉर्मूला वन.दरअसल 30 अक्तूबर को भारत में पहली बार फ़ॉर्मूला वन रेस आयोजित किया गया था..इसके लिए विशेष ट्रैक बनाया गया..इस रेस के दौरान कारें जब ३०० किमी./घंटा की रफ्तार से ट्रैक पर गुजरी तो उसके रोमांच को चाहे वो टीवी पर लाइव देख रहे हों..य़ा सजीव आंखों से..सभी कारों की कानफाड़ू गर्जना, हाई स्पीड फ्यूल से निकलता घना धुआं, ट्रैक पर उड़ती धूल और ट्रैक पर घिसटते टायरों के निशान के बीच जो ड्राइवर सबसे तेज समय निकालने में सफल हो रहा था..उसे देखकर सब आश्चर्यचकित हो रहे थे..इस खेल के बारे में मैंने बीबीसी से कुछ जानकारियां इक्ट्ठी की..जिससे मुझे इस खेल के बारे में कई रोचक बातें जानने को मिली.. फ़ार्मूला वन  ये खेल मोटर स्पोर्ट्स क...

कहां तुम चले गए..

लाखों दिलों पर राज करने वाले गजल सम्राट हम सभी को अलविदा कह गए..गजल की दुनिया का चमकता-दमकता सितारा हमारे बीच से चला गया..हमेशा के लिए जगजीत सिंह हमें छोड़ गए..लेकिन अपने गीतों के बीच वे अमर हो गए हैं.. होठों से छू लो तुम..., ये दौलत भी ले लो..., होशवालों को खबर क्‍या..., हजारों ख्‍वाहिशें ऐसी..., हाथ छूटे भी तो..., जैसे अनगिनत सुरीली गजलों को आवाज देने वाले जगजीत सिंह अब नहीं रहे..ब्रेन हमरेज से जूझ रहे जगजीत सिंह का आठ बजकर 10 मिनट पर देहांत हो गया है..जगजीत सिंह के निधन के साथ ही मौसिकी की दुनिया का एक कालखंड समाप्‍त हो गया..प्रख्यात गजल गायक  जगजीत सिंह ने अपनी मखमली आवाज के जरिए गजलों को नया जीवन दिया..वह अपने जीवन के70वें साल का जश्न अनोखे ढंग से मनाना चाहते थे..उनकी इस साल 70 संगीत समारोहों में शिरकत करने की हसरत थी लेकिन सोमवार को अपने निधन से पहले तक वह केवल 46 संगीत समारोहों में ही शामिल हो सके थे.. सिंह ने पंडित छगनलाल शर्मा और उस्ताद जमाल खान से संगीत की शिक्षा ली थी..उनकी गजल व भजन गायन की अलग शैली ने उन्हें बहुत जल्दी जाना-पहचाना नाम बना दिया, 70 व 80 के दशक में उनक...

बॉडीगार्ड एक प्रेम कहानी

फिल्म बॉडीगार्ड एक प्रेम कहानी है..और इसका क्लाइमैक्स काफी दमदार है..इस फिल्म को सलमान की एक्टिंग और एक बेहतरीन क्लाइमैक्स के लिए जाना जाएगा..फिल्म में लवली सिंह एक बॉडीगार्ड है और वह एक ही एहसान चाहता है कि उस पर किसी किस्म का एहसान ना किया जाए..उसे दिव्या की रक्षा का जिम्मा सौंपा जाता है..परछाई की तरह लवली उसके साथ लग जाता है और इससे दिव्या परेशान हो जाती है..लवली से छुटकारा पाने के लिए दिव्या फोन पर छाया बनकर लवली सिंह को प्रेम जाल में फांसती है..लवली भी धीरे-धीरे छाया को बिना देखे ही चाहने लगता है..किस तरह से दिव्या अपने ही बुने हुए जाल में फंस जाती है यह फिल्म का सार है..कुछ बढ़िया एक्शन दृश्यों के बाद प्रेम कहानी शुरू हो जाती है..फर्स्ट हाफ तक तो ठीक लगता है, लेकिन इसके बाद यह खींची हुई लगने लगती है..लेकिन क्लाइमेक्स में कई उतार-चढ़ाव आते हैं जिससे दर्शक एक बार फिर फिल्म से बंध जाता है..फिल्म के अंत में कई संयोग देखने को मिलते हैं, और एक सुखद क्लाइमैक्स भी..कहानी कई सवाल उठाती हैं, जिसमें सबसे अहम ये है कि दिव्या जब सचमुच में लवली को चाहने लगती है तो वह असलियत बताने में इतना वक्त...

आरक्षण नहीं शिक्षा की जरुरत

राजनीति के बाद निर्देशक प्रकाश झा ने एक बार फिर अपनी फिल्म आरक्षण के जरिए समाज से जुड़े एक अहम मुद्दे को उजागर किया है..ये फिल्म अलग-अलग नजरिए से हमें दिखाती है कि आरक्षण पर होने वाली राजनीति का शिकार अंत में आम जनता ही होती है..फिल्म में अमिताभ का डॉयलाग भारत में दो भारत बसते हैं..सहित कई संवाद दिल को झंकझोरने के लिए काफी है..फिल्म दो वर्ग की खाई को पाटने वाली है तोड़ने वाली नहीं..फिल्म में ये संदेश दिया गया है कि समाज के विकास के लिए एक मात्र रास्ता हर वर्ग, हर जाति के बच्चे को शिक्षा का बेहतर मौका देना है...ये प्रतिक्रिया महज सामान्य वर्ग के लोगों की ही नहीं हैं, जिस वर्ग के साथ मजाक किए जाने की बात कही जा रही है..फिल्म काफी अच्छी है, उसमें दो वर्गो को लड़ाने वाली बात पूरी तरह गलत है, इस फिल्म में बिहार के सुपर-30 की झलक दिखाई देती है.. फिल्म में प्रभाकर आनंद (अमिताभ बच्चन) और सुपर-30 के आनंद कुमार के पढ़ाने की शैली एक है..अमिताभ का फिल्म में गणित (मोड जेड =1) की पढ़ाई यहां के गणितज्ञ आनंद से बिल्कुल मिलती-जुलती है...इस फिल्म की शूटिंग के पूर्व फिल्म के निर्देशक प्रकाश झा ने सुपर-30...

पत्रकारों का एनकाउंटर करने पर अमादा छत्तीसगढ़ पुलिस...

छत्तीसगढ़ में पुलिस बेखौफ हो गई है..कभी खुलेआम पुलिस अपने मातहत अधिकारियों के सामने गार्ड को लात-घूंसे से मारती हैं..तो कभी बीच सड़क पर पत्रकारों पर अपनी दबंगई दिखाती है..नक्सल मोर्चे पर छत्तीसगढ़ पुलिस की फर्जी मुठभे़ड़ की कई दास्तां जगजाहिर है..लेकिन अभी तक बेकसूर आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने वाली छत्तीसगढ़ पुलिस के निशाने पर आम लोगों की आवाज उठाने वाले पत्रकार हैं..छत्तीसगढ़ के दूरस्थ आदिवासी अंचलों में पुलिस की फर्जी मुठभेड़ की लंबी फेहरिस्त है..लेकिन अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आदिवासी अंचलों में पुलिस के फर्जी मुठभेड़ों को सामने रखने वाले पत्रकारों को उनका एनकाउंटर कर देने की धमकी देने का सनसनीखेज मामला सामने आया है.. दरअसल गुरूवार दोपहर जब छत्तीसगढ़ पुलिस के तमाम अधिकारी अपने चैंबर में पहुँचकर अपने काम में मशगूल हो गए..तब इन तमाम अधिकारियों के गनमैन और ड्राइवर ने पुलिस मुख्यालय को जुए का अड्डा बना दिया..ऐसे में साधना न्यूज मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए पुलिस मुख्यालय में जवानों द्वारा लंबे-लंबे जुए का दांव लगाते हुए ...

नक्‍सली इलाके में जवानों के लिए अंधेरे में चिराग बन गए पत्रकार

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से महज 170 किलोमीटर की दूरी पर हुई नक्सली घटना में पत्रकारों ने पुलिस के लिए अंधेरे में चिराग की तरह काम किया.. दरअसल भारी बारिश, घनघोर अंधेरा.. पहाड़ी रास्ते. और नक्सली खौफ के बीच रायपुर से निकले कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार पुलिस से पहले घटनास्थल पर पहुँच गए.. जब वे इतनी विषम परिस्थितियों में फुटेज बनाकर राजधानी की तरफ लौट रहे थे.. तभी घटनास्थल पर पहुँचने की कोशिश कर रही पुलिस की टीम ने उन मीडियाकर्मियों को रोक लिया. मीडियाकर्मियों पर पहले पुलिस ने संदेह करते हुए सवालों की झड़ी लगा दी.. पुलिस की टीम जब पूरी तरह से आश्वस्त हो गई कि उनकी कस्टडी में खड़े लोग मीडियाकर्मी हैं.. तो उन्होंने पहले तो पूरा वीडिया फुटेज देखा.. उसके बाद घटनास्थल की पूरी जानकारी लेने के बाद घटनास्थल पर चलने को कहा.. अपने सामाजिक दायित्वों को समझते हुए भारी बारिश और नक्सली खौफ के बीच मीडियाकर्मी पुलिस के साथ पैदल मार्च करते हुए घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.. पत्रकारों की इस पहले से तीन घंटे के बाद पुलिस वाले गुरुवार की सुबह मौका-ए-वारदात पर पहुँचे.. जहां का मंजर काफी भयावह था.. ...

जिंदगी न मिलेगी दोबारा

जिंदगी क्या है..जितनी बहस की जाए..उतनी कम है.....लेकिन जोया अख्तर की फिल्म जिंदगी न मिलेगी दोबारा में जिंदगी के मायने को समेटने की कोशिश की गई है..जिंदगी ना मिलेगी दोबारा..निश्चित तौर पर किसे क्या पता..उसे यह जिंदगी दोबारा मिलेगी या नहीं..जिंदगी एक कारवां है..जिंदगी एक सफर है..इस सफर को अपने अपने अंदाज में हर कोई जीना चाहता है..लेकिन जिंदगी में इतने उतार-चढ़ाव आते हैं कि कोई जिंदगी के थपेड़ों को हंसते हंसते सह जाता है..तो कोई इन थपेड़ों का सामना नहीं कर पाता..जिंदगी ना मिलेगी दोबारा हमें जिंदगी में किसी भी बात का अफसोस न करने की सीख देती है..वह बताती है कि कैसे आप अपने आज को खुशहाल बना कर भविष्य को भी सुरक्षित और खुशियों से भरपूर बना सकते हैं..जिंदगी न मिलेगी  दोबारा  उन आजाद परिंदों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनकी जिंदगी में अपनी-अपनी कुछ परेशानियां हैं...लेकिन इसके बावजूद वे उसे छुपा कर नए तरीके से अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं..जिंदगी के हर स्वाद का मजा कैसे लिया जाता है..यह फिल्म के तीन किरदारों को देख कर आप अनुमान लगा सकते हैं..जिसे देखकर आप को भी एहसास होगा कि ये ...

13 का घिनौना खेल...

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई बुधवार को एकबार फिर एक के बाद एक तीन धमाकों से दहल उठी.शहर के भीड़भाड़ वाले झावेरी बाजार, दादर तथा चरनी रोड के ओपरा हाउस में हुए विस्फोटों में धमाकों से कई लोग काल के गाल में समा गए..और सैकड़ों घायल हो गए..बेकसूरों की मौत का आखिर जिम्मेदार कौन है..आखिर कब तक..बेकसूरों की खून ऐसी हो कब तक बहती रहेगी..धमाके के पीछे इंडियन मुजाहिदीन के हाथ होने की आशंका जताई जा रही है..इस आशंका के पीछे पुख्ता तर्क भी हैं..जब-जब इंडियन मुजाहिदीन ने धमाके किए उसने 13 और 26 तारीख को ही इसके लिए चुना..यही नहीं, उसने अब तक धमाके के लिए शाम 6 से 7 बजे के वक्त को ही चुना..आज भी 13 तारीख है और तीनों धमाके शाम 6 से 7 के बीच हुए हैं..गौरतलब है कि इससे पहले 13 और 26 तारीख को अहमदाबाद और दिल्ली में धमाके हुए थे..बुधवार हुए धमाकों का पैटर्न भी इंडियन मुजाहिदीन द्वारा पहले कराए गए धमाकों से मिलती-जुलती है...हालांकि अभी तक किसी ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है.. इंडियन मुजाहिदीन अक्सर हमले के बाद हमले की जिम्मेदारी का मेल न्यूज चैनलों को भेजती है.. मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकवादी हमल...

भारतीय रेल का दुर्भाग्य!

10 जुलाई रविवार का दिन रेल इतिहास के लिए सबसे काला दिन साबित हुआ..एक ही दिन हुए दो रेल हादसों ने रेलवे की पोल खोल दी...असम और उत्तर प्रदेश में इन रेल हादसों ने एक बार फिर रेलवे को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं..सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्‍या रेलवे नेताओं के लिए वोट बटोरने का जरिया बन गया है और यात्रियों की जान की चिंता किए बिना नेता अपना हित साधने के लिए रेलवे का दोहन कर रहे हैं..रेल हादसे के बाद मुसाफिरों के आंखों में आंसू भी नहीं बचे..वहीं इन आंसू पर राजनीतिक पार्टियां सियासत करती नजर आ रही है..आखिर ये रेल हादसे कब रूकेगा..इसका जवाब किसी भी सफेदपोश के पास नहीं है..आईए थोड़ा गौर फरमाते हैं..पिछले कुछ सालों में हुए रेल हादसों के बारे में.. 03 दिसम्बर 2000- पंजाब के सराय बंजारा और साधूगढ़ के बीच हावड़ा-अमृतसर एक्सप्रेस एक मालगाडी़ से जा टकराई थी। इस भिड़ंत में 46 यात्री मारे गए थे जबकि 130 से अधिक घायल हुए थे। 22 जून 2001- केरल के कोझीकोड़ के निकट मैंगलोर चेन्नई एक्सप्रेस के कादालुंडी नदी में गिर जाने से 40 रेल यात्री मौत का शिकार बने थे। 5 जनवरी 2002- सिकंदराबाद-मनमाड़ एक्सप्रेस महारा...