Skip to main content

13 का घिनौना खेल...


देश की आर्थिक राजधानी मुंबई बुधवार को एकबार फिर एक के बाद एक तीन धमाकों से दहल उठी.शहर के भीड़भाड़ वाले झावेरी बाजार, दादर तथा चरनी रोड के ओपरा हाउस में हुए विस्फोटों में धमाकों से कई लोग काल के गाल में समा गए..और सैकड़ों घायल हो गए..बेकसूरों की मौत का आखिर जिम्मेदार कौन है..आखिर कब तक..बेकसूरों की खून ऐसी हो कब तक बहती रहेगी..धमाके के पीछे इंडियन मुजाहिदीन के हाथ होने की आशंका जताई जा रही है..इस आशंका के पीछे पुख्ता तर्क भी हैं..जब-जब इंडियन मुजाहिदीन ने धमाके किए उसने 13 और 26 तारीख को ही इसके लिए चुना..यही नहीं, उसने अब तक धमाके के लिए शाम 6 से 7 बजे के वक्त को ही चुना..आज भी 13 तारीख है और तीनों धमाके शाम 6 से 7 के बीच हुए हैं..गौरतलब है कि इससे पहले 13 और 26 तारीख को अहमदाबाद और दिल्ली में धमाके हुए थे..बुधवार हुए धमाकों का पैटर्न भी इंडियन मुजाहिदीन द्वारा पहले कराए गए धमाकों से मिलती-जुलती है...हालांकि अभी तक किसी ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है.. इंडियन मुजाहिदीन अक्सर हमले के बाद हमले की जिम्मेदारी का मेल न्यूज चैनलों को भेजती है..मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकवादी हमले के एक मात्र जीवित हमलावर अजमल कसाब का जन्मदिन भी आज है...कसाब को हमलों के मामले में मौत की सजा सुनाई जा चुकी है..अभी तक किसी संगठन ने हमलों की जिम्मेदारी नहीं ली है लेकिन मुंबई पुलिस को इसमें इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के हाथ होने का संदेह है..लूम हो कि 2008 में जयपुर में 13 मई को बम धमाके हुए थे..उसी साल 26 जुलाई को अहमदाबाद में बम ब्लास्ट हुए थे...उसके बाद 13 सितंबर को दिल्ली बम ब्लास्ट का निशाना बनी..जबकि उसी साल 26 नवंबर को मुंबई में देश का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था..आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले साल 13 फरवरी 2010 को एक बार फिर आतंकवादियों ने पुणे में धमाके के लिए चुना था...भारत हमेशा ही आतंकियों के निशाने पर रहा है, 2008 में 26 नवंबर के मुम्बई हमले के बाद से देश में कोई आतंकी घटना नही हुई थी, लेकिन अब मुंबई में धमाको के बाद आतंकियों ने अपने मंसूबे फिर जाहिर कर दिए है..पिछले कुछ सालों में देश में हुए बड़े बम धमाके...

आतंकी बनाते हैं 13 का आकंड़ा
दिल्ली मे 13 सितंबर 2008 को सिलसिलेवार धमाके किए गए जिसमें भारी संख्या में लोग हताहत हुए। इससे पहले 13 मई 2008 को जयपुर में हुए सीरीयल बम धमाको में मासूमो का खून बहा और अब एक बार फिर आतंकियो ने 13 तारीख को मनहूस बनाते हुए पुणें में बम धमाका किया। पुणें में यह अब तक की सबसे बड़ी आतंकी घटना है।
13 मार्च 2003
मुंबई में एक ट्रेन में हुए धमाके में 11 लोगों की मौत हो गई.
25 अगस्त 2003
मुंबई में एक के एक दो कार बम धमाकों में 60 लोगों की मौत हो गई.
15 अगस्त 2003
असम में हुए धमाके में 18 लोग मारे गए जिनमें ज़्यादातर स्कूली बच्चे थे.
29 अगस्त 2003
नई दिल्ली के तीन व्यस्त इलाक़ों में हुए धमाकों में 66 लोगों ने अपनी जान गँवाई.
7 मार्च 2006
वाराणसी में हुए तीन धमाकों में कम से कम 15 लोग मारे गए जबकि 60 से ज़्यादा घायल हुए.
11 जुलाई 2006
मुंबई में कई ट्रेन धमाकों में 180 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई.
8 सितंबर 2006
महाराष्ट्र के मालेगाँव में कुई सिलसिलेवार धमाकों में 32 लोग मारे गए.
19 फरवरी 2007
भारत से पाकिस्तान जा रही ट्रेन में हुआ धमाका. इस धमाके में 66 लोगों की मौत हो गई जिनमें से ज़्यादातर पाकिस्तान के नागरिक थे.
18 मई 2007
हैदराबाद की मशहूर मक्का मस्जिद में शुक्रवार की नमाज़ के दौरान धमाका हुआ. जिनमें 11 लोगों की मौत हो गई.
25 अगस्त 2007
हैदराबाद के एक पार्क में तीन धमाके हुए जिनमें कम से कम 40 लोग मारे गए.
11 अक्तूबर 2007
अजमेर में ख़्वाजी ग़रीब नवाज़ की दरगाह पर हुआ धमाका. धमाके में दो लोगों की मौत हो गई.
23 नवंबर, 2007
वाराणसी, फ़ैज़ाबाद और लखनऊ के अदालत परिसर में सिलसिलेवार धमाके हुए जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई और 50 से ज़्यादा घायल हो गए.
13 मई 2008
जयपुर में सात बम धमाके हुए. जिनमें कम से कम 63 लोगों की मौत हो गई.
25 जुलाई 2008
बंगलौर में हुए सात धमाके. जिनमें दो व्यक्तियों की मौत हो गई और कम से कम 15 घायल हुए.
26 जुलाई 2008
अहमदबाद में लगातार कई धमाके हुए जिनमें 49 लोग मारे गए
13 सितंबर 2008
दिल्ली में हुए सिलसिलेवार धमाकों में 22 लोगों की मौत हो गई थी.
6 अप्रैल 2009
गुवाहटी के मालेगांव में ब्‍लास्‍ट में छह लोगों की मौत हो गई थी। 32 घायल हो गए थे।



Comments

Popular posts from this blog

मीडिया को भी अन्नागीरी की जरूरत

भ्रष्टाचार..एक ऐसी समस्या जिसका हल ढूंढते नजर आ रहे हैं..वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं गांधीवादी नेता अन्ना हजारे..लेकिन क्या दीमक की तरह खोखला कर रहे इस देश को भ्रष्टाचार रूपी कीड़े से बचाया जा सकता है..जिसने अपना पैर पुरजोर तरीके से लोकतंत्र के सभी स्तंभों में जमा लिया है..हमारा देश लोकतांत्रिक देश है..लोकतंत्र..एक ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें जनता अपना शासक खुद चुनती है..और जहां लोगों को जीने की आजादी हो और लोगों के अधिकारों का हनन न हो... लोकतंत्र के तीन मुख्य स्तम्भ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में सर्वजन ने प्रेस अर्थात मीडिया को स्वीकार किया है..लेकिन क्या भारत में ये सारे स्तंभ सही रूप से काम कर रहे हैं..क्या भ्रष्टाचार ने सिर्फ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को ही जकड़ा है..मीडिया क्या इससे अछूता है..शायद नहीं..मीडिया में भी भ्रष्टाचार उतना ही व्यापत है..जितना लोकतंत्र के बाकी स्तंभों में..ऐसे में पुरजोर तरीके से भ्रष्टाचार की आवाज उठाने वाले तथाकथित लोकतंत्र के इस स्तंभ के लिए भी एक ड्राफ की जरूरत है..जिसके जरिए भ्रष्टाचार में...

आई एम इन हांटेड

भारत में गिनी-चुनी 3-डी फिल्में बनी हैं..अब थ्री-डी फिल्मों का दौर फिर शुरू हो गया है इसलिए वर्षों बाद हांटेड नामक 3-डी फिल्म जब सामने आई..तो इसे देखे बिना मैं नहीं रह सका...लेकिन इस फिल्म के देखने के साथ ही मेरे साथ ही इस फिल्म की पटकथा जैसी कुछ घटना घटी..जिसकी वजह से मैं उसे पल को शब्दों में बांध कर सहजने की कोशिश कर रहा हूँ...दरअसल इस फिल्म में नायक नायिका को बचाने के लिए अस्सी साल पहले जाता है.और अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर नायिका की जिंदगी संवार देता है..इस फिल्म को देखने के बाद मन में उतना भय तो नहीं हुआ..लेकिन फिल्म देख कर जब मैं बाहर निकला तो आसमान में गरजते-घुमरते बादलों से जमीन पर गिर रही बूंदों ने मन में जरूर भय पैद कर दिया..बेमौसम बारिश से जहां मई की चिल्लाती धूप से राहत मिली...वहीं मुझे यह भी खराब लग रहा था कि काफी मेहनत कर आज अपने रूम की सफाई करने के बाद कपड़े, जूत्ते, चादर और गद्दे धूप में डालकर फिल्म देखने आया था..मुझे यहां हांडेट के नायक से ईर्ष्या भी हो रही थी कि मैं भी नायक की तरह कुछ पल पीछे चला जाता और अपने मेहनत को इस तरह बारिश की बूंदों में बरबाद नहीं होने द...

नक्‍सली इलाके में जवानों के लिए अंधेरे में चिराग बन गए पत्रकार

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से महज 170 किलोमीटर की दूरी पर हुई नक्सली घटना में पत्रकारों ने पुलिस के लिए अंधेरे में चिराग की तरह काम किया.. दरअसल भारी बारिश, घनघोर अंधेरा.. पहाड़ी रास्ते. और नक्सली खौफ के बीच रायपुर से निकले कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार पुलिस से पहले घटनास्थल पर पहुँच गए.. जब वे इतनी विषम परिस्थितियों में फुटेज बनाकर राजधानी की तरफ लौट रहे थे.. तभी घटनास्थल पर पहुँचने की कोशिश कर रही पुलिस की टीम ने उन मीडियाकर्मियों को रोक लिया. मीडियाकर्मियों पर पहले पुलिस ने संदेह करते हुए सवालों की झड़ी लगा दी.. पुलिस की टीम जब पूरी तरह से आश्वस्त हो गई कि उनकी कस्टडी में खड़े लोग मीडियाकर्मी हैं.. तो उन्होंने पहले तो पूरा वीडिया फुटेज देखा.. उसके बाद घटनास्थल की पूरी जानकारी लेने के बाद घटनास्थल पर चलने को कहा.. अपने सामाजिक दायित्वों को समझते हुए भारी बारिश और नक्सली खौफ के बीच मीडियाकर्मी पुलिस के साथ पैदल मार्च करते हुए घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.. पत्रकारों की इस पहले से तीन घंटे के बाद पुलिस वाले गुरुवार की सुबह मौका-ए-वारदात पर पहुँचे.. जहां का मंजर काफी भयावह था.. ...