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आखिर कब तक !

नक्सलियों की एक बाद एक खौफनाक और दिल को दहला देनेवाली वारदातें..जो देश के दिल पर एक ऐसा घाव छोड़ गया है...जिसको भर पाना काफी मुश्किल हैं...लेकिन हमारे राजनेता न जाने क्यों..अपने बयानबाजी से बाज नहीं आते..जो मन में आ रहा है..बोले जा रहे हैं...लेकिन कोई भी नक्सली समस्या के हल के बारे में  सार्थक बात नहीं करता..नक्सली समस्या..हमारे सामने ऐसा विकराल रूप लेगा..ऐसा किसी ने सोचा न होगा..लेकिन इस समस्या ने न सिर्फ विकराल रूप लिया है..बल्कि यह एक ऐसी चुनौती बन गई है..जिसे निपट पाना हमारे सरकारों के लिए मुश्किल भरा है...एक के बाद एक नक्सली अपनी वारदातों को अंजाम देते जा रहे हैं.और हमारे पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं..नक्सलियों की रणनीति सफल होती जा रही है..और हमारी असफल..आखिर हमारी रणनीति में चूक कहां है..जिसके कारण मुठ्ठी भर नक्सली हमारी सुरक्षा तंत्र पर भारी पड़ रहे हैं...यह सच है कि उन्हें पहाड़, जंगल, झरने और स्थानीय लोगों का सहयोग मिलता है...इसका मतलब यह कि नहीं हम नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब नहीं दे सकते...पश्चिम बंगाल के झारग्राम में हुए ताजा नक्सली हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिय...

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सवाल ?

मीडिया के वे दिग्गज जिन्होंने कई मिसालें कायम की.अगर उनके तरफ से किसी प्रकार का दोयम दर्जे का काम किया जाता है..तो वह काफी झकझोरने वाला होता है..ऐसे ही दो दिग्गज इस समय सवालों के घेरे में हैं..बरखा दत्त और वीर सांघवी..केंद्रीय संचार मंत्री पद पर ए.राजा को काबिज कराने व संचार मंत्रालय से कारपोरेट घरानों को लाभ दिलाने के मामले में जिस माडर्न दलाल नीरा राडिया का नाम उछला है, उसकी फोन टेपिंग से पता चला है कि उसकी तरफ से बरखा दत्त और वीर सांघवी ने भी राजा को मंत्री बनाने के लिए शीर्ष कांग्रेसियों के बीच लाबिंग की.बरखा दत्त और वीर सांघवी पर आरोप लग रहे हैं कि साल 2009 में डीएमके नेता ए राजा के लिए संचार मंत्री बनाने के लिए कांग्रेसी नेताओं से लॉबिंग करने का,और वो भी एक दलाल नीरा राडिया के कहने पर. दरअसल इस पूरे प्रकरण में आयकर महानिदेशक के द्वारा जांच के बाद ये तथ्य सामने आये हैं की इन दोनों दिग्गज पत्रकारों के सम्बन्ध नीरा राडिया से रहे हैं.और नीरा के कहने पर इन लोगों ने लोकसभा चुनाव के बाद ए राजा के लिए लॉबिंग की..यूपीए सरकार का पहला कार्यकाल काफी पाक-साफ समझा गया था, जिसमें सिर्फ स्पेक्ट्...

माओवादियों का सबसे बड़ा लाल सलाम...

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सुरक्षाकर्मियों पर भयावह नक्सली हमले ने केन्द्र और राज्य सरकारों की नक्सल विरोधी रणनीति पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं. साधना न्यूज की सशक्त रिपोर्टिंग और कवरेज से केन्द्र और राज्य सरकार की खामियां सामने आईं हैं. पिछले काफी समय से मैं नक्सल मामलों पर कवरेज करता आ रहा हूँ लेकिन जिस तरह से चिंतलनार में नक्सलियों ने खूनी खेल खेला....वह दिल को दहला देने वाला है. बस्तर का पूरा इलाका इस बड़ी त्रासदी के बाद स्तब्ध है. सभी यही सवाल कर रहे हैं कि कब तक हम सपूतों की मौत को शहीद बताकर माताओं की गोद सूनी करते रहेंगे...मासूमों के सिर से पिता क प्यार एवं सुहागिनों का सिंदूर उजड़ता देखेंगे..खुफिया तंत्र की निकम्मेपन के कारण आज इतनी बड़ी वारदात करने में नक्सली कामयाब हो गए..इसमें चूक कहां हो गई.. परत-दर-परत से साधना की टीम ने वह खबर सामने लाई.जिसकी दरकार लोगों को थी..साधना की पूरी टीम ने इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखी..एवं सरकार और पुलिस प्रशासन से कहां-कहां भूल हुई..उसको सामने लाया.घटनास्थल का दर्दनाक विजुअल सामने लाने से लेकर लाइव कवरेज तक में हमने प्रशासन को हिला कर र...

कहां गए मानवाधिकार कार्यकर्ता ?

नक्सली हिंसा...शहीद होते हमारे जवान..और शहादत को सलाम करते हम लोग..यह क्रम कब तक चलता रहेगा..यह समझ से परे हैं...जब-जब हमारे जवान कोई बड़ी कार्रवाई करते हैं..तब-तब आदिवासियों का हितैषी बत्ताने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता खड़े हो जाते हैं..लेकिन जवानों के शहीद होने के बाद यही मानवाधिकार कार्यकर्ता चुप्पी साध लेते हैं..आखिर ऐसा क्यों...क्या जवानों का कोई अधिकार नहीं..नक्सली देश के प्रथम शत्रु हैं,लेकिन यह जानना कठिन है कि उन कथित बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार समर्थकों के खिलाफ कड़ाई क्यों नहीं की जा रही जो नक्सलियों की खुली वकालत करने में लगे हुए हैं...ऐसे तत्व नक्सलियों का पक्ष लेने और यहां तक कि उनकी हिंसा जायज ठहराने के लिए नित-नए कुतर्क गढ़ रहे हैं और ऐसे गुमराह करने वाले सवाल भी उछाल रहे हैं...देश के लिए दंतेवाड़ा की घटना से लगे सदमे से उबरना आसान नहीं है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अक्सर कहते रहे हैं कि माओवादी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.दंतेवाड़ा जिले के मुकराना जंगल में जिस घातक ढंग से माओवादियों ने सीआरपीएफ़ के 76 जवानों की हत्या की, उससे इस बात का मतलब लोगों को अब ...

हम भी पढ़ेंगे...

आओ स्कूल चले हम..ये स्लोगन अब तक बड़े-बड़े होर्डिंग और सार्वजनिक स्थानों की दीवारों की शोभा बढ़ाया करते थे.और इस स्लोगन को कोरा साबित करता..वहीं पर कचरा उठाते मासूम और नन्हें वे बच्चे..जो स्कूल तो जाना चाहते हैं...लेकिन कुछ मजबूरी वश नहीं जा पाते...देश में गरीब वर्ग के बच्चों को भी अच्छी शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से शिक्षा का मौलिक अधिकार कानून लागू किया गया है..जो ऐसे बच्चों के लिए मील का पत्थऱ साबित हो सकता है..संविधान का 86वां संशोधन वर्ष 2002 में पास हुआ और कानून 2009 में बनकर एक अप्रैल 2010से लागू हुआ.... भारत अब उन कुछ चुनिंदा देशों में आ गया, जहां शिक्षा सभी के लिए मूलभूत अधिकार है और 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त अनिवार्य शिक्षा दिया जाएगा..लेकिन लोगों का इससे जुड़ाव तभी बनेगा जब सरकारी तंत्र सबको शिक्षा दिलाने के प्रति अपनी इच्छाशक्ति और ईमानदारी दिखाएगा..प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने राष्ट्र को संबोधित कर यह संदेश देने को कोशिश की है कि सरकार इसे लेकर बेहद गंभीर है..गौरतलब है कि इस कानून के जरिए मुफ्त और अनिवार्य बुनियादी शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दे दिया गया है..इ...

लिव com रिलेशन

समाज और लोग कितना ही नाक भौंह सिकोडें, कितने ही कुढ़ लें और कितनी ही आलोचना कर लें...लिव-इन-रिलेशन रिश्ता अब एक ठोस वास्तविकता लेता जा रहा है... इसे नकारा जाना नामुमकिन हैं..समाज में ऐसे रिलेशन देखने को मिल रहे हैं..कुछ साल पहले तक समाज के लिए वर्जित रहा लिव-इन-रिलेशन रिश्ता धीरे-धीरे अर्बन सोसायटी में अपनी जगह बनाने में सफल हो गया है...बीपीओ और कॉर्परट सेक्टर में लाखों रुपये महीने कमा रहे कई यूथ कपल इस रिलेशनशिप को बुरा नहीं मानते..इस रिश्ते की चकाचौंध सिर्फ महानगरों तक ही सिमटी थी...लेकिन धीरे-धीरे इस कल्चर ने छोटे शहरों पर भी अपना असर डाला है..अब उच्चतम न्यायालय ने भी इस रिश्ते पर अपनी मुहर लगा दी है..सुप्रीम कोर्ट ने विवाह पूर्व यौन संबंध और लिव इन रिलेशन को लेकर जो टिप्पणी की है, वह बेहद महत्वपूर्ण है..उसने कहा है कि शादी के पहले सेक्स संबंध कायम करना कोई अपराध नहीं है..भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है जो शादी से पहले यौन संबंध की मनाही करता हो..इसी तरह अगर दो बालिग व्यक्ति आपसी रजामंदी से विवाह के बगैर भी साथ रहना चाहें तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है..दक्षिण की अभिनेत्री खुशबू की विशे...

आंदोलन का भटकाव और कानू दा की मौत

नक्सली जो कर रहे हैं.वह सही है.या गलत..यह भारत में नक्सलवादी आंदोलन के जनक कहे जाने वाले बुजुर्ग माओवादी नेता कानू सान्याल की मौत से समझा जा सकता है..कानू सान्याल की खुदकुशी माओवादियों के लिए आंख खोलने वाली साबित हो सकती है..सान्याल के साथ काम कर चुके कई वरिष्ठ नक्सलवादी नेताओं के मुताबिक अतिवादी कदम उठाकर सान्याल ने हिंसा में लगे माओवादियों को इशारा दिया कि वे जो कर रहे हैं, गलत है..उनकी मौत खुदकुशी का साधारण मामला नहीं है..यह जन्मजात क्रांतिकारी का विरोध है..नए जमाने के माओवादियों को उनका यह संदेश है कि वे जो कर रहे हैं वह अंतत: उसी तबके पर असर कर रहा है, जिसके लिए उन्होंने हथियार उठाए हैं..अपने अंतिम दिनों में कानू दा बार-बार कहते थे कि माओवादी रेड कॉरिडोर पर कब्जा बनाए रखने के लिए उनसे इत्तेफाक नहीं रखने वाले गरीबों को मार रहे हैं..फिर सुरक्षा बलों की कार्रवाई का भी गरीब ही शिकार बन रहे हैं..यह विचार उन्हें बेचैन करता था और अंतत: विरोध में उन्होंने खुदकुशी जैसा अतिवादी कदम उठा लिया.करीब चार दशक पहले पिछली सदी के सत्तर के दशक के आखिरी वर्षो में उन्होंने चारू मजूमदार के साथ मिलकर...