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आई एम इन हांटेड

भारत में गिनी-चुनी 3-डी फिल्में बनी हैं..अब थ्री-डी फिल्मों का दौर फिर शुरू हो गया है इसलिए वर्षों बाद हांटेड नामक 3-डी फिल्म जब सामने आई..तो इसे देखे बिना मैं नहीं रह सका...लेकिन इस फिल्म के देखने के साथ ही मेरे साथ ही इस फिल्म की पटकथा जैसी कुछ घटना घटी..जिसकी वजह से मैं उसे पल को शब्दों में बांध कर सहजने की कोशिश कर रहा हूँ...दरअसल इस फिल्म में नायक नायिका को बचाने के लिए अस्सी साल पहले जाता है.और अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर नायिका की जिंदगी संवार देता है..इस फिल्म को देखने के बाद मन में उतना भय तो नहीं हुआ..लेकिन फिल्म देख कर जब मैं बाहर निकला तो आसमान में गरजते-घुमरते बादलों से जमीन पर गिर रही बूंदों ने मन में जरूर भय पैद कर दिया..बेमौसम बारिश से जहां मई की चिल्लाती धूप से राहत मिली...वहीं मुझे यह भी खराब लग रहा था कि काफी मेहनत कर आज अपने रूम की सफाई करने के बाद कपड़े, जूत्ते, चादर और गद्दे धूप में डालकर फिल्म देखने आया था..मुझे यहां हांडेट के नायक से ईर्ष्या भी हो रही थी कि मैं भी नायक की तरह कुछ पल पीछे चला जाता और अपने मेहनत को इस तरह बारिश की बूंदों में बरबाद नहीं होने देता..लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था..काले बादलों से मुझे काफी मायूसी हाथ लग रही थी..क्योंकि वे और गरजना के साथ छप्पर फाड़ कर बरस रहे थे..और में चाहकर भी तीन किलोमीटर दूर अपने रूप में पहुँच नहीं सकता था..क्योंकि अगर बारिश में भींग कर मैं चला भी जाता तो मेरे कपड़े और जूत्ते भींग जाते..और मुझे और मुसिबतों का सामना करना पड़ता..क्योंकि मुझे फिल्म के बाद बस्तर उपचुनाव कवरेज के लिए 500 किलोमीटर की दूरी भी तय करनी थी..ऐसे हालात में मैं सोचता रहा कि काश फिल्म के नायक की तरह मैं भी पीछे लौट सकता..लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं था..क्योंकि सिर्फ ये फिल्मों में ही होता है..खैर बारिश खत्म होने तक मैं इंतजार करता रहा..बारिश खत्म होने के बाद मैं रूम पर पहुँचा..लेकिन वहां पहुँचकर मैं भी फिल्म की नायक की तरह सुखंद क्लाइमेक्स पर खुशी महसूस कर रहा था...क्योंकि जो न होने देने के लिए मैं फिल्म के नायक से अपनी तुलना कर रहा था..वह हो चुका था..और मेरे अंदर का नायिकत्व जाग उठा था..क्योंकि मेरे घर साइड बारिश ही नहीं हुई..जबकि घर से कुछ फलांग दूर बारिश ने जमकर सबको भिंगोया था..लेकिन मेरी मेहनत पर शायद बादल महोदय को तरस आया..और वे वहां बिना बरसे ही वहां से चले गए थे..मैंने भी बादल जी को धन्यवाद बोला और फटाफट मकान की छत पर पड़े सामानों को समेटने लगा..खैर मैं हांटेड फिल्म के नायक की तरह पीछे जाकर नियती को तो नहीं बदला..लेकिन मनचाही मुराद पूरी होने के बाद मैं भी हांटेड नायक की तरह अपने आप पर गर्व करने लगा..






 खैर अब फिल्म की भी बात कर लें..हॉरर फिल्म को यदि थ्री-डी तकनीक का सहारा मिल जाए तो डर पैदा करने वाले दृश्यों का असर और गहरा हो जाता है..जो इस फिल्म के साथ है..अन्य हॉरर फिल्मों की कहानी की तरह ही इसमें भी फिल्म की शुरुआत ऊंटी के एक बंगले से ही होती है.इस बंगले का इतिहास बेहद खौफनाक है..लोगों का मानना है कि इसमें कई आत्माओं का साया है....धीरे-धीरे इस घर से राज उठते जाते हैं..और इसके बवंडर में फंसते जाते हैं फिल्म के अहम किरदार..अन्य हॉरर फिल्मों की तरह ही इस फिल्म में भी एक के बाद एक भयानक दृश्य दिखाये जाते हैं..‘हांटेड’ का हीरो अस्सी बरस से कैद एक लड़की की आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए सन 1936 में चला जाता है..वर्तमान वर्ष से 1936 में जाना 75 वर्ष पहले का समय होता है, लेकिन फिल्म में 80 वर्ष का समय बताया जाता है..हीरो न केवल उस दौर में चला जाता है बल्कि वह उस घटना को भी रोकने में कामयाब हो जाता है जिसकी वजह से उस लड़की की मौत हो जाती है.थ्री-डी में होना इस फिल्म का खास आकर्षण है..कुछ हॉरर सीन थ्री-डी में देखना रोंगटे खड़े कर देता है.. अभिनय के दृष्टिकोण से देखें तो महाअक्षय की यह दूसरी फिल्म है..पहली फिल्म जिम्मी से उन्होंने निराश किया था..इस फिल्म में उन्होंने थोड़ा बेहतर करने की कोशिश की है..अपने पिता मिथुन से वह डांसिंग स्टेप्स दिखाने में वह माहिर नजर आए हैं..मीरा के रूप में टिया का किरदार अच्छा है..उन्होंने टेलीविजन की दुनिया से फिल्मों में कदम रखा है..उन्होंने खुद को साबित करने की कोशिश की है.कुल मिला कर फिल्म तकनीकी दृष्टिकोण से काफी अच्छी है..

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