जब दुनियाभर में सचिन के क्रिकेट जीवन के बीस साल पूरे होने पर उनकी क्रिकेट जीवन की इबारत लिखी जा रही थी..ठीक उसी समय....शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सचिन के खिलाफ पार्टी के मुखपत्र सामना में जहर उगल कर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश की... सचिन तेंदुलकर को मराठी मानूस वाले खांचे में फिट करने की कोशिश करके बाल ठाकरे ने जहां राष्ट्रीय एकता का अपमान किया है वहीं सचिन को भी नुकसान पहुचाने की कोशिश की है सचिन तेंदुलकर आज एक विश्व स्तर के व्यक्ति हैं. पूरे भारत में उनके प्रसंशक हैं. जगह-जगह उनके फैन क्लब बने हुए हैं. पूरे देश की कंपनियों से उन्हें धन मिलता है क्योंकि वे उनके विज्ञापनों में देखे जाते हैं. इस तरह के व्यक्ति को अपने पिंजड़े में बंद करने की बाल ठाकरे की कोशिश की चारों तरफ निंदा हो रही है. विधान सभा चुनावों में राज ठाकरे की मराठी शेखी की मदद कर रही, कांग्रेस पार्टी ने भी बाल ठाकरे की बात का बुरा माना है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, अशोक चह्वाण ने भी बाल ठाकरे को उनके गैर ज़िम्मेदार बयान के लिए फटकार लगाई है. . लगता है कि शिवसेना के बूढ़े नेता से नौजवानों के हीरो सचिन तेंदुलकर की अपील के तत्व को समझने में गलती हो गयी क्योंकि अगर कहीं सचिन तेंदुलकर ने अपनी नाराज़गी को ज़ाहिर कर दिया तो शिवसेना का बचा-खुचा जनाधार भी भस्म हो जाएगा. पता नहीं बाल ठाकरे को क्यों नहीं सूझ रहा है कि सचिन तेंदुलकर की हैसियत बहुत बड़ी है और किसी बाल ठाकरे की औकात नहीं है कि उसे नुकसान पंहुचा सके. हाँ अगर सचिन की लोकप्रियता की चट्टान के सामने आकर उसमें सर मारने की कोशिश की तो बाल ठाकरे का कुनबा मराठी समाज के राडार से हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा. क्योंकि जिंदा कौमें अपने हीरो का अपमान करने वालों को कभी माफ़ नहीं करतीं.सचिन तेंडुलकर ने कहा कि मैं मराठी हूं, पर पहले हिंदुस्तानी हूं और मुंबई पूरे हिंदुस्तान की है...इस पर शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कहा कि सचिन ने मराठियों का अपमान किया है....वह कम बोलें और अपने खेल पर ज्यादा ध्यान दें...ठाकरे साहब ने पैर पटकने की अपनी आदत के कारण कुछ ज्यादा ही सख्त पत्थर पर लात मार दी है...वह अकेले मराठी नहीं हैं...सचिन तेंडुलकर भी मराठी ही हैं, जो उनसे अलग विचार रखते हैं...लता मंगेशकर और ऊषा भोसले भी मराठी हैं, जिन्होंने हिंदी गीतों को अपनी साधना का क्षेत्र बनाया...बाबूराव विष्णु पराड़कर भी मराठी थे, जिन्होंने हिंदी की पत्रकारिता के प्रतिमान गढ़े...भीमराव आंबेडकर ने खुद को महाराष्ट्र का संविधान लिखने तक सीमित नहीं रखा, न ही बाल गंगाधर तिलक ने का आजादी का संघर्ष मुंबई तक सीमित रखा, हालांकि ये दोनों मराठी थे....बाल ठाकरे का मराठी गौरव का जो फॉर्म्युला है, उसके अनुसार इन महापुरुषों के योगदान को भी लज्जाजनक बताना होगा....क्या ठाकरे साहब ऐसा कर सकते हैं? इस मुद्दे के व्यक्तिवादी पक्ष पर भी विचार किया जाए....जब बाबा साहब माइकल जैक्सन को बुलाते हैं तो मराठी संस्कृति को आंच नहीं आती, लेकिन एक फिल्म के पोस्टर में करीना कपूर की पीठ दिखने पर उनके कार्यकर्ता पोस्टर फाड़ने लगते हैं.... ठाकरे साहब खुद हिंदी में 'दोपहर का सामना' अखबार निकालें तो मराठी को चोट नहीं लगती, लेकिन कोई दूसरा हिंदी के पक्ष में कुछ बोल दे तो वे मराठी के नुकसान की बात उठाने लगते हैं....जो चीजें व्यक्तिगत रूप से उन्हें पसंद हैं, क्या केवल उन्हीं से मराठी मानुस की भावना और प्रतिष्ठा की रक्षा होती है, और उन्हें जो नापसंद है, उससे मराठी भावना का अनादर होने लगता है...सचिन तेंदुलकर को नसीहत देने वाला बाल ठाकरे का सम्पादकीय उसी लुम्पन राजनीति के खोये हुए स्पेस को फिर से हासिल करने की कोशिश है लेकिन लगता है कि इस बार दांव उल्टा पड़ गया है. बाल ठाकरे के बयान पर पूरे देश में नाराज़गी व्यक्त की जा रही है. हालांकि इस बात की ठाकरे ब्रांड राजनीति करने वालों को कभी कोई परवाह नहीं रही लेकिन अब शिवसेना की सहयोगी पार्टी बीजेपी ने भी सार्वजनिक रूप से सचिन तेंदुलकर को सही ठहरा कर बाल ठाकरे को बता दिया कि किसी भी राजनीतिक पार्टी के बर्दाश्त की भी एक हद होती है और बीजेपी के लिए ठाकरे की हर बात को सही कहना संभव नहीं होगा. बीजेपी का बयान किसी प्रवक्ता टाइप आदमी ने नहीं दिया है. पार्टी की तरफ से उनके सबसे गंभीर और प्रभावशाली नेता , अरुण जेटली ने बयान दिया है. अरुण जेटली कोई प्रकाश जावडेकर या रवि शंकर प्रसाद तो हैं नहीं कि उनके बयान को कोई बड़ा नेता खारिज कर देगा. इसलिए अब यह शिव सेना को तय करना है कि मराठी मानूस की अहंकार पूर्ण नीति चलानी है कि सही तरीके से राजनीतिक आचरण करना है. अरुण जेटली के बयान का साफ़ मतलब है कि बीजेपी अब शिवसेना के उन कारनामों से अपने को अलग कर लेगी जो देशवासियों में नफरत फैलाने की दिशा में काम कर सकते होंगें..राजनैतिक रूप से भी वह मराठी भावना को समझने का दावा अकेले नहीं कर सकते। उन्हें लगता है कि मराठी मानुस उद्धव का नेतृत्व स्वीकार करेगा, लेकिन वह राज ठाकरे को वोट दे आता है, शरद पवार को वोट दे आता है, अशोक चव्हान को वोट दे आता है। जाहिर है, मराठी मानुस सिर्फ उनके साथ नहीं है...दूसरी तरफ, सचिन अगर दिल्ली के कोटला मैदान में तालियां बटोरते हैं तो मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में भी उन्हें यूपी और झारखंड के खिलाड़ियों के साथ मिलकर खेलना होता है... मराठी या गुजराती या असमिया या बिहारी गौरव बढ़ाने के लिए हर नायक को अपने दायरे का विस्तार करना होता है....ठाकरे साहबान तो उसे और संकुचित बना रहे हैं....वह मुंबई को अपनी जेब में रखना चाहते हैं और विदर्भ का नाम नहीं लेना चाहते, जहां किसान आत्महत्या कर रहे हैं...लेकिन जो हिंदुस्तान सचिन पर गर्व करता है और जिसे मुंबई अपना लगता है, विदर्भ के लिए उसका कलेजा फटता है....जब मुंबई पर 26 नवंबर का हमला होता है..तो उसके बाद सचिन द्वारा खेली जाने वाली शतकीय पारी इस हमले में अपनी जिंदगियों को खो चुके मृतकों के परिजनों के चेहरे पर खुशी बिखरने के नाम होता है...ऐसे में बाल ठाकरे ने सचिन पर टिप्पणी कर क्रिकेट प्रेमियों को आहत करने का काम किया है.
भ्रष्टाचार..एक ऐसी समस्या जिसका हल ढूंढते नजर आ रहे हैं..वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं गांधीवादी नेता अन्ना हजारे..लेकिन क्या दीमक की तरह खोखला कर रहे इस देश को भ्रष्टाचार रूपी कीड़े से बचाया जा सकता है..जिसने अपना पैर पुरजोर तरीके से लोकतंत्र के सभी स्तंभों में जमा लिया है..हमारा देश लोकतांत्रिक देश है..लोकतंत्र..एक ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें जनता अपना शासक खुद चुनती है..और जहां लोगों को जीने की आजादी हो और लोगों के अधिकारों का हनन न हो... लोकतंत्र के तीन मुख्य स्तम्भ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में सर्वजन ने प्रेस अर्थात मीडिया को स्वीकार किया है..लेकिन क्या भारत में ये सारे स्तंभ सही रूप से काम कर रहे हैं..क्या भ्रष्टाचार ने सिर्फ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को ही जकड़ा है..मीडिया क्या इससे अछूता है..शायद नहीं..मीडिया में भी भ्रष्टाचार उतना ही व्यापत है..जितना लोकतंत्र के बाकी स्तंभों में..ऐसे में पुरजोर तरीके से भ्रष्टाचार की आवाज उठाने वाले तथाकथित लोकतंत्र के इस स्तंभ के लिए भी एक ड्राफ की जरूरत है..जिसके जरिए भ्रष्टाचार में...


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