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मन में फैले अंधियारे को कैसे दूर करूँ ?

जिंदगी के इस मोड़ पर
खुद को अकेला पाता हूँ..
सबतरफ चमक ही चमक है..
फिर भी मेरा मन अंधियारापुंज है...
रौशनी की तलाश है मुझे..
लेकिन रौशनी कहीं दूर है..
जाने कहां ढूंढे उसे
यही मेरे मन में द्वंद है..
खो गया उन लम्हों में.
जब थी मेरी जिंदगी हसीन
वह पल और यह पल
काफी फर्क क्यों है
जिंदगी में कई यादें संजोएँ
उन यादों में खोएँ-खोएँ
अकेला-तान्हां,चला आया मैं
न जाने कितने दूर
जहां हूँ अकेला
तान्हाई को चीरती
रौशनी की तलाश में
जिंदगी के इस मोड़ पर
खुद को अकेला पाता हूँ..

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साहित्य और समाचार का संगम ।
बधाई ।

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